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डॉक्टर बनने के योग

- पं. अशोक पंवार 'मयंक'
एकादश भाव आय का, पंचम भाव संतान, विद्या, मनोरंजन का भाव है। इस एकादश भाव से पंचम भाव पर सूर्य, चंद्र, शुक्र की सप्तम पूर्ण दृष्टि पती है। वहीं मंगल की दशम भाव से अष्टम एकादश भाव से सप्तम व धन, कुटुंब भाव से चतुर्थ दृष्टि पूर्ण पती है। गुरु धर्म, भाग्य भाव नवम से पंचम भाव पर नवम दृष्टि डालता है तो एकादश भाव से सप्तम लग्न से पंचम दृष्टि पूर्ण पती है। शनि की तृतीय दृष्टि तृतीय भाई, पराक्रम भाव से एकादाश भाव से सप्तम व अष्टम भाव से दशम पूर्ण दृष्टि पती है। यहाँ पर हमारे अनुभव अनुसार राहू-केतु जो छाया ग्रह है उनके बारे में विशेष फल नहीं मिलता न ही इनकी दृष्टि को माना जाता है न ही किसी एकादश भाव पर रहने से पंचम भाव पर कोई असर आता है।

सर्वप्रथम सूर्य को लें यहां से यदि पंचम भाव पर सिंह राशि अपनी स्वदृष्टि से देखता है तो भले ही आय में कमी हो, लेकिन विद्या व संतान उत्तम होती है, संतान के बहोने पर लाभ मिलता है। एकादश भाव में कोई ग्रह हो, नीच को छोसभी शुभफल प्राप्त होते हैं। सूर्य की तुला राशि पर दृष्टि संतान व विद्या में कष्टकारी होती है। अतः ऐसे जातकों को सूर्य की आराधना व सूर्य से संबंधित वस्तुओं का दान अपने शरीर से सात या नौ बार उतार कर रविवार को करना चाहिए। इस प्रकार अनिष्ट प्रभाव से बचा जा सकता है। जिन ग्रहों की नीच दृष्टि पउससे संबंधित दान करें।

चंद्रमा की स्वदृष्टि पंचम भाव पर पतो जातक शांति नीति वाला, ज्ञानी, सच्चरित्र, गुणी, मान-सम्मान पाने वाला होता है उसे भूमि में गधन मिलता है। ऐसा जातक मिलनसार होता है। अशुभ वृश्चिक राशि को देखता हो तो चंद्र की वस्तु दान करना ही श्रेष्ठ रहेगा। मंगल की शत्रु नीच दृष्टि यदि पंचम भाव पर पती हो तो संतान से कष्ट, विद्या में कमी रहती है। यदि मित्र स्वदृष्टि हो तो संतान आदि में उत्तम लाभ रहता है।

यदि मंगल दशम भाव से स्वदृष्टि वृश्चिक राशि को देखता हो तो वह जातक चिकित्सा क्षेत्र में होता है और सर्जन बनता है। ऐसा जातक यदि फौजदारी में रहे व वकालात करे तो भी लाभ पाता है। मंगल की चतुर्थ दृष्टि पंचम भाव पर उच्च, स्व मित्र दृष्टि के रुप में पतो वह विद्या के क्षेत्र में उत्तम लाभ पाता है। वहीं उसकी संतान भी स्वस्थ, उत्तम, धनी होती है। धन कुटुंब से भी उत्तम लाभ पाता है। मंगल की नीच शत्रु दृष्टि पसे धन, कुटुंब से हानि, विद्या में मन न लगना आदि होता है। बुध की उच्च स्वदृष्टि संतान, विद्या में उत्तम लाभकारी होती है। मित्र दृष्टि हो तो जातक को सभी सुख मिलते हैं। ऐसा जातक चित्रकला, शिल्पकला, लेखक, पत्रकार आदि होता है। व्यापार-व्यवसाय में भी सफल होता है।

गुरु यदि पंचम दृष्टि से देखता हो तो वह जातक ईमानदार, कर्त्तव्यनिष्ठ, आज्ञाकारी होता है। न्यायाधीश, उच्च प्रशासनिक अधिकारी भी हो सकता है। वृषभ का गुरु होकर पंचम भाव को देखता हो तो ऐसा जातक कामातुर होता है। नवम भाव से गुरु पंचम भाव पर दृष्टि स्व, उच्च, मित्र रखता हो तो ऐसा जातक विद्वान, ज्ञानी, संतों का सेवक, धर्म-कर्म में पूर्ण आस्थावान होता है तथा उसकी संतान भाग्यशाली होती है। गुरु की एकादश भाव से पूर्ण दृष्टि पती है तो ऐसा योग संतान में बाधक भी बन जाता है व देर से संतान होती है। शत्रु या नीच दृष्टि पती हो तो उसकी स्त्री बांझ भी हो सकती है। संतान अधर्मी, कष्टकारी होती है, लेकिन ऐसा जातक धन से सुखी होता है।

शुक्र की एकादश भाव से स्वदृष्टि विद्या, मनोरंजन के क्षेत्र से, इलेक्ट्रॉनिक, व्यापार से, इंजीनियर में सफलता पाता है। मनोविनोदी कन्या संतति अधिक होती है। ऐसे जातकों के अनेक स्त्रियों से संबंध होते है। मित्रों से लाभ पाने वाला, खर्चीला भी होता है।

शनि की पंचम भाव पर तृतीय भाव से तृतीय स्व, उच्च दृष्टि, मित्र दृष्टि विद्या में, संतान आदि में थोविलंब से लाभ दिलाती है व जातक संतान से दुःखी रहता है। शनि की एकादश भाव से पूर्ण दृष्टि स्व, मित्र पसे राज्यपक्ष से लाभ पाने वाला, वाहनादि से पूर्ण, उत्तम धन पाने वाला रहता है। शनि की दशम दृष्टि अष्टम भाव से पत्नी से सुखी रखती है वहीं संतान भी आज्ञाकारी होती है, लेकिन शत्रु नीच दृष्टि पतो संतान आदि से कष्ट मिलता है।

उपरोक्त ग्रह स्थिति में किसी भी ग्रह कीअशुभ दृष्टि पंचम भाव पर पती हो तो उन ग्रहों से संबंधित दान की वस्तुएँ उसी दिन को अपने शरीर से 9 बार उतारकर उसी रंग के कपमें बांधकर जमीन में गादेने से अशुभ प्रभाव में न्यूनता आ जाती है।

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