शुभ मुहूर्त में ही करे यात्रा
- पं. अशोक पंवार 'मयंक'
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यात्रा कभी भी किसी भी समय की जा सकती है। रोजमर्रा के कार्यों से यात्रा होती रहती है या एक शहर से दूसरे शहर रेल या बस द्वारा जाना भी यात्रा कहलाता है। यदि यह यात्रा सर्विस हेतु की जाए तब तो मुहूर्त का देखना कोई मायने नहीं रखता, क्योंकि रोज-रोज जाने वाले कब तक मुहूर्त देखेंगे, लेकिन जो व्यक्ति खास कार्य के लिए यात्रा करता है, तब दिशाशूल, मुहूर्त आदि देखकर यात्रा करने से वह यात्रा उन्नतिदायक होती है। जो यात्रा एक दिवस में पूर्ण हो जाए, उसमें भी यात्रा विचार आवश्यक नहीं होता।
यदि किसी मैत्री हेतु या अदि विशिष्ट कार्य हेतु यात्रा करना हो, तब अश्विन मास शुक्ल पक्ष की दशमी याने विजयादशमी के दिन यात्रा करना शुभ परिणाम देने वाली साबित होती है। यदि इस दिन श्रावण नक्षत्र हो तो ऐसी विजयादशमी विशेष शुभ फलप्रद होती है। ऐसे मुहूर्त में की गई यात्रा विजय दिलाती है। यात्रा के समय अंतःकरण की शुुद्धि और अंग स्फूरणादि शुभ शगुन से यात्रा उत्तम शुभ फलदायक होती है। इसके साथ-साथ लग्र बल विचार के साथ की जाने वाली यात्रा से सिद्धिदायक होती है। मन प्रसन्नचित्त हो, तब यात्रा करना चाहिए। उद्विग्न मन से कभी भी यात्रा नहीं करना चाहिए, चाहे शुभ शगुन ही क्यों न हो।
यदि अपने परिवार में यज्ञोपवीत, देवता प्रतिष्ठा, विवाह, होलिकादि उत्सव और जन्म मरणादिक सूतक आ गए हों तो उक्त कार्यों की परिसमाप्ति तक यात्रा कदापि नहीं करना चाहिए। इसी प्रकार असमय पर बिजली आदि गिरना, बादल का गर्जन, वृष्टि, पाला गिरना इत्यादि दुष्ट समयों में ७ दिवस तक यात्रा करना वर्जित है।
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